Monday, 10 August 2015

Film "Masaan" "fly away solo" n Dushyat kumar

तू  किसी  रेल  सी  गुजरती  है
मैं  किसी  पुल  सा  थरथराता  हूँ
इन पंक्तियों के साथ साथ बनारस के प्राचीन पुल के ऊपर दूर से रेल का गुजरना अच्छा लगता है
कुल मिला कर मसानपर दुष्यंत कुमार का प्रभाव दिखा मै भी दुष्यंत जी से प्रभावित हूँ पर कभी मुलाकात नहीं हुई उनकी रचनाएं अवश्य नाटको में उनसे रूबरू कराती रही है परन्तु अगर आज की पीढ़ी की बात करे तो शायद हालत कुछ ऐसे है यहाँ दरख्तों के साए में धुप लगती है क्यों की आज के नौजवान मसान फिल्म के  दीपक की तरह ही सवाल करता है जैसे कौन ग़ालिब और कौन निदा फ़ाजली
खैर अंत मै एक बार फिर कहूँगा की मुझे दुष्यंत जी की पूरी कविता ही फिल्म की कहानी लगी

एक जंगल है तेरी आँखों में
मै जहां राह भूल जाता हूँ
मै तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने करीब पाता हूँ
तू किसी रेल सी गुजरती है
मै किसी पुल सा थरथराता हूँ
हर तरफ एतराज होता है
मै अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाजू उखड गया जब से
और ज्यादा वजन उठता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में..

फिल्म बहुत उम्दा है बधाई नीरज भाई 

Thursday, 30 July 2015

प्रासंगिक - कोकिला व्रत 
अखंड सोभाग्य की कामना के लिए इस बार कोकिला व्रत का संयोग 19 वर्ष बाद आ रहा है द्वितीय आषाढ़ शुक्ल की पूर्णिमा (31 जुलाई 2015)से श्रावण माह की पूर्णिमा तक यह व्रत चलेगा जिसमे महिलाये कोयल की मूर्ति बना कर स्वर्ण के पंख और मोती की आँख लगा कर उसकी पूजा कर ब्राम्हण से कथा सुनकर कोयल की आवाज सुनकर ही व्रत खोलती है परन्तु विडम्बना यह है की कोयल की आवाज़ सुनी कहा जाए 19 वर्षों में जो पर्यावरण में बदलाव आया है और कंक्रीट का जो जंगल उग आया है वहां कोयल कहा और कोयल ही क्यों गौरया, टिटोड़ी तोता मैना किसी की भी आवाज़ नहीं सुनाई देती ....
          माना की हमारे पूर्वज प्रकृति प्रेमी थे और हमारी संस्कृति में पर्यावरण का महत्व था मसलन पीपल, बड, नीम की पूजा होती है तो क्या ये जरुरी नहीं की हम अपनी संस्कृति को बचने के लिए पर्यावरण को बचाए ? और यदि नहीं बचा पाए तो क्या हमारे व्रत उपवास पूजा पाठ सब ख़त्म .....
     खैर ये तो भविष्य की बाते है परन्तु वर्तमान में मुझे उन महिलाओं की चिंता है जो कोयल की आवाज सुन कर व्रत खोलेंगी   
-भूषण जैन 30 जुलाई 2015


Monday, 20 July 2015

बाहुबली के माध्यम से एस. एस. राजमोली ने जो सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये है वाकई राजमोली और उनकी टीम बधाई की पात्र है. यदि सच कहा जाये तो ये सफलता है मेहनत और लगन की जिसने 8 साल के सपने को साकार किया है सच में कल्पनाशीलता और तकनीक के समागम का ये जादुई संसार सर चढ़ कर बोलता है मै स्वयं इस फिल्म को तीन बार देखने के बाद भी. पुनः इसे देखने को लालाईत हूँ ...परन्तु प्रश्न ये है की क्या राज मोली के इस रचनात्मक कीर्तिमान के बाद भारतीय सिनेमा में तकनीक और बड़े बजट की भव्यता का एक नया सिनेमाई दौर आरम्भ होगा .....क्या यथार्थवादी सिनेमा का अस्तित्व नहीं रहेगा ....खैर जो भी हो ये तो भविष्य के गर्भ में है

हाँ इस समय बधाई देना चाहूँगा बाहुबली के पिता को यानि की एस. एस. राजमोली के पिता विजेंद्र प्रसाद जी को जिनकी लिखी दो फिल्मे एक साथ सिनेमाघरों में है बाहुबली और बजरंगी भाई जान

Saturday, 7 February 2015

अजीब सी पहेली है ये प्यार भी  
हम जिसे चाहते है उसे पता भी नहीं है 
और जो हमें चाहता है वो बताता भी नहीं है