“तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ”
इन पंक्तियों के साथ साथ बनारस के प्राचीन पुल के ऊपर दूर से रेल का गुजरना अच्छा लगता है
कुल मिला कर “मसान” पर दुष्यंत कुमार का प्रभाव दिखा मै भी दुष्यंत जी से प्रभावित हूँ पर कभी मुलाकात नहीं हुई उनकी
रचनाएं अवश्य नाटको में उनसे रूबरू कराती रही है परन्तु अगर आज की पीढ़ी की बात करे
तो शायद हालत कुछ ऐसे है “यहाँ दरख्तों के साए में धुप लगती है” क्यों की आज के नौजवान मसान फिल्म के दीपक की तरह ही सवाल करता है “जैसे कौन ग़ालिब और कौन निदा फ़ाजली”
खैर अंत मै एक बार फिर कहूँगा की मुझे दुष्यंत जी की
पूरी कविता ही फिल्म की कहानी लगी
एक जंगल है तेरी आँखों में
मै जहां राह भूल जाता हूँ
मै तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने करीब पाता हूँ
तू किसी रेल सी गुजरती है
हर तरफ एतराज होता है
मै अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाजू उखड गया जब से
और ज्यादा वजन उठता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में..
फिल्म बहुत उम्दा है बधाई नीरज भाई




