Saturday, 24 October 2015
Saturday, 10 October 2015
Tuesday, 1 September 2015
Friday, 14 August 2015
"Baahubali the beginning" और मेरी सोच
जैसा की आप
जानते ही है अभी अभी एस एस राज मौली की फिल्म “बाहुबली द बिगनिंग” 250 करोड़ की निर्माण लागत, भव्य सेट और विशेष द्रश्य प्रभाव से जादुई संसार रचने वाली
वाली फिल्म है, जिसने लगभग 600 करोड़ का व्यवसाय किया और देश की पहली ज्यादा कमाई करने
वाली फिल्म का इतिहास रच दिया अवश्य ही इसके
लिए राज मौली और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है
एक
फिल्म विद्यार्थी होने के नाते मैंने ये फिल्म सात बार देखि और इससे तो कुछ सिखने
वाले तत्व पाए वो आपके साथ बाटना चाहता हूँ
मेरी
समझ के अनुसार बाहूबली की कहानी का जो काल है वो लगभग 8वी शताब्दी के आसपास होना चाहिए. और ये कहानी युद्ध, राज्य लिप्सा और
नायक की बहाद्दुरी, सह्रदयता और प्रेम की कहानी है
साथ ही विशेष गौर करने
वाली बात यह की लेखक ने मध्य प्रदेश के मालवा निमाड़ को उल्लेखित किया है, हो सकता
है की ये महज़ एक संयोग हो फिर भी मुझे उज्जैन वासी होने के नाते प्रसन्नता देता है, जैसे महिष्मति निमाड़ के महेश्वर का ही एक नाम है और स्वामी
जी द्वारा शिवा की माँ को कहना की “शिव की शक्ति जानती हो मन से महाकाल का अभिषेक
करो“ एवं नायिका तमन्ना भाटिया का नाम फिल्म में “अवंतिका” होना जो की उज्जैन का ही
दूसरा नाम है
फिल्मकी
शुरुआत एक राजसी बालक को एक आदिवासी परिवार द्वारा बचाने से होती है और वही परिवार
उसे पालता है ..बचपन से ही वो जल पर्वत पर चढ़ने का प्रयास करता है लेकिन सफल
नहीं हो पता एक दिन उसे जल पर्वत के झरने से एक लकड़ी का मुखोटा प्राप्त होता है
जिसकी बालू पर प्रतिकृति उसे जल पर्वत पर चढ़ने की काल्पनिक प्रेरणा देती है और
अंततः शिवा पर्वत के शिखर पर पहुँच जाता है परन्तु वहां पहुचने पर उसे एक अलग ही कथानक
से रूबरू होना पड़ता है जहां उसे मालुम होता है की वह महिष्मति साम्राज्य का
उत्तराधिकारी है जो की उसकी सोच से परे था आप कभी नहीं जान पाते की आपके एक लक्ष्य
को प्राप्त करने के बाद आगे कोनसा लक्ष्य आपके लिए तय्यार खड़ा है जो आपको किस
उंचाई तक ले जाएगा लेकिन इस सब के लिए जरुरी है की आप अपने प्रथम लक्ष्य को हासिल
करे
फिल्म में
महिलाओं को सामान अधिकार और सम्मान देना अच्छा लगा फिल्म की कहानी के अनुसार
आदिवासियों का नेता अवंतिका को भल्लाल देव(राणा दुग्गावती) को मार कर
देवसेना(अनुष्का) को छुडवाने की जवाबदारी देता है वही दूसरी और शिवगामिनी(रम्या
कृष्णन) महिष्मति के राजा और स्वयं के देवर के मरने के बाद राज्य का भार स्वयं ले
लेती है जबकि उसका पति बिज्जलदेव (नज़ीर) ये कर सकता था जिसे की अपंगता के कारण
राज्य नहीं मिला किन्तु शिवगामिनी आगे आकर अपना कर्त्तव्य निभाती है वो भी बिना
किसी पद को ग्रहण करे वो कहती है “वो स्थान मेरा नहीं है .........मेरा वचन ही है
शासन”
युद्ध में
मैदान में भी शिवगामिनी की उपस्तिथि के द्रश्य महिलाओ को पुरुषो के सामान ला खड़ा
करते है और एक शिक्षा भी देते है की किसी भी जिम्मेदारी को निभाने या अग्रगामी
बनने के लिए किसी पद की आवश्यकता नहीं है बस अपने कर्त्तव्य को निष्ठा पूर्वक पालन
करने की आवश्यकता है
भल्लाल और
बाहुबली को बचपन से अस्त्र शस्त्र शास्त्र निति की शिक्षा दी जाती है ताकि उनमे से कोई एक
भविष्य में अपने आप को महिष्मति साम्राज्य का शासक सिद्ध कर सके फिल्म के एक
द्रश्य में बाबुबली अपना राजसी भोजन छोड़ कर कटप्पा(सत्य राज) जो की महिष्मति का
वफादार गुलाम है के साथ उसका भोजन करना चाहता है काफी न नुकुर के बाद बाहुबली के
प्रेम के कारण अंततः कटप्पा बाहुबली को अपना भोजन देता है ये घटना बाहुबली
को उन लोगो के दिल में एक स्थान देती है और भल्लाल से अलग साबित करती है ...एक सफल
राजा वही है जो किसी भय के कारण नहीं बल्कि प्रेम और सम्मान के कारण प्रजा के दिल
में रहे
किस प्रकार निति पूर्वक कम संसाधनों का पूर्ण उपयोग कर चार
गुना शक्तिशाली शत्रु का मुकाबला किया जाए करना जाये यह भी कथानक में बताया गया जैसे
की कालकेय के पास 100000 सेनिक है लेकिन महिष्मति के पास 25000 जाहिर सी बात है की
कालकेय को उसका फायदा मिलेगा परन्तु बाहुबली (प्रभास) त्रिशूल विह्यु रचना की सलाह
देता है जो की पहले किसी ने नहीं अपनाई थी बिज्जल देव उसे स्वीकार नहीं करते
क्योकि त्रिशूल विह्यु किताबी उदाहरण है लेकिन शिवगामिनी और भाल्लाल सहमति देते है
“क्योकि जब किसी ने त्रिशूल विह्यु का उपयोग नहीं किया तो कालकेय ने भी नहीं किया
होगा” और उपलब्ध 25000 सैनिकों में से 10000 बाहुबली के नेतृत्व में और 10000
भाल्लाल देव के नेतृत्व में दो तरफ से आक्रमण करेंगे और कट्टपा (सत्य राज) 5000
सैनिको के साथ मुख्य द्वार का बचाव करेंगे इस प्रकार प्रयेक सेनिक और उपलब्ध
संसाधन का पूर्ण उपयोग किया गया
नायक आवश्यकता होने पर आविष्कार करता है ये भी शिक्षाप्रद
है ....बिज्जलदेव चालाकी से तलवारों वाला रथ और एक बार में सहस्त्रों तीर चलाने
वाले सारे उच्च कोटि के अस्त्र भाल्लाल को दे देते है और किले की दीवारे गिराने के
काम आने वाले अस्त्र बाहुबली को देते है ....कटप्पा के कहने पर बाहुबली सामान
अस्त्रों की मांग कर सकता था किन्तु उसने कुछ नया सोचा उसने ज्वलनशील तेल में भीगा
कपडा किले की दिवार तोड़ने वाले गोलों से बांध कर दाग दिए जिससे शत्रु सेना अचंभित
थी वो कुछ समझते इससे पहले बाहुबली तीर द्वारा उन कपड़ो में आग लगा कर सेकड़ों
दुश्मन सेनिको को मार गिराता है तात्पर्य
यह की जो साधन प्राप्त है उन्ही से कुछ ऐसा किया जाए की सफलता प्राप्त हो
एक अग्रगामी या नायक की भूमिका उसके अपने दल में उत्साह के
संचार और उसे बनाये रखने की भी होती है और यही सफलता का द्योतक है ऐसा ही उदाहरण बाहुबली
द्वारा प्रस्तुत किया गया ...कालकेय के विरुद्ध युद्ध में जब महिष्मति के सैनिक
मरने लगते है और उनमे म्रत्यु का डर घर कर जाता है और तब वे रण भूमि से भागने लगते
है तब बाहुबली उन्हें रोक कर पूछता है
“महासेना! क्या है म्रत्यु ....हमारे आत्म बल से शत्रु का
बल ज्यादा है ये सोचना है म्रत्यु! रणभूमि
में शत्रु से भयभीत होकर जीवित रहना है म्रत्यु!
जिस नीच ने हमारी माँ का अपमान किया वो हमारी आँखों के सामने अट्टहास कर
रहा है उसका सिर काट कर माँ के चरणों में अर्पित करने की जगह पीठ दिखाकर भागना है
म्रत्यु ....मेरी माँ और मात्रभूमि को कोई नीच छू नहीं सकता ये उस नीच को मारकर
उसे बताने रहा हूँ मै .. मेरे साथ आएगा कोन”
ये एक ऐसी पुकार थी जो महिष्मति के सैनिकों को पुनः लड़ने के
लिए प्रेरित करती है और कालकेय पर महिष्मति को विजय दिलाती है किन्तु दूसरी और भाल्लाल्देव को ऐसी परिस्तिथि
में कोई फर्क नहीं पड़ता.....यहाँ ये सिखने योग्य बात है की अग्रगामी को साथ में
रहकर प्रेरणा देकर परिस्तिथियों का हल निकालना चाहिए
उस युद्ध में एक प्रतियोगिता भी थी की जो कोई भी
युवराज कालकेय सेना नायक का वध करेगा वो ही महिष्मति साम्राज्य का शासक होगा
युद्ध में भाल्लाल देव का ध्यान
केवल और केवल कालकेय को मारने का मौका पाने की कोशिश में था
यहाँ तक की एक द्रश्य में कालकेय अपने बचाव के लिए महिष्मति के नागरिको को
बंधक बना कर सेना के आगे कर देता है तब भाल्लाल देव अपने ही राज्य के निर्दोष
नागरिको को मार कर आगे बढ़ जाता है जब की सामान परिस्तिथि में बाहुबली बड़ी चतुराई
से पहले नागरिको को सुरक्षित कर के कालकेय सेना पर आक्रमण करता है बाहुबली का ऐसा
ही दया का चरित्र युद्ध के पूर्व देवी माँ काली के समक्ष होने वाली बलि के समय भी
प्रगट होता है भाल्लाल देव जहां निरीह पशु की बलि स्वयं देता है वहीँ बाहुबली इस
बलि को निराधार बताते हुए बलि नहीं देता और स्वयं का रक्त देवी को अर्पित करता है इन
दोनों द्रश्यो में ये बात सिद्ध होती है की मानवता सर्वोपरि है और एक राजा में
प्रजा और निरीह प्राणियों के प्रति दया भाव अवश्य होना चाहिए
खैर बाते तो बहुत है क्योकि 7 बार फिल्म जो
देखि है फिर भी अंत में कहूँगा बहुत ही अच्छी फिल्म है कल्पना का बहुत ही सुन्दर
साम्राज्य कलाकारों का दमदार अभिनय वेशभूषा इत्यादि ने जो जादू रचा उसके जादूगर एस
एस राजा मोली और साथियों के साथ ही बाहुबली फिल्म के कल्पनाशील लेखक विजेंद्र
प्रसाद जी को साधुवाद जिन्होंने इस फिल्म का कथानक लिखा और
इतनी शिक्षा दी बहरहाल 2016 में प्रदर्शित होने वाले अगले भाग “बाहुबली द
कन्क्लूजन” के इंतजार में.....भूषण एन. जैन
Monday, 10 August 2015
Film "Masaan" "fly away solo" n Dushyat kumar
“तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ”
इन पंक्तियों के साथ साथ बनारस के प्राचीन पुल के ऊपर दूर से रेल का गुजरना अच्छा लगता है
कुल मिला कर “मसान” पर दुष्यंत कुमार का प्रभाव दिखा मै भी दुष्यंत जी से प्रभावित हूँ पर कभी मुलाकात नहीं हुई उनकी
रचनाएं अवश्य नाटको में उनसे रूबरू कराती रही है परन्तु अगर आज की पीढ़ी की बात करे
तो शायद हालत कुछ ऐसे है “यहाँ दरख्तों के साए में धुप लगती है” क्यों की आज के नौजवान मसान फिल्म के दीपक की तरह ही सवाल करता है “जैसे कौन ग़ालिब और कौन निदा फ़ाजली”
खैर अंत मै एक बार फिर कहूँगा की मुझे दुष्यंत जी की
पूरी कविता ही फिल्म की कहानी लगी
एक जंगल है तेरी आँखों में
मै जहां राह भूल जाता हूँ
मै तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने करीब पाता हूँ
तू किसी रेल सी गुजरती है
हर तरफ एतराज होता है
मै अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाजू उखड गया जब से
और ज्यादा वजन उठता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में..
फिल्म बहुत उम्दा है बधाई नीरज भाई
Thursday, 30 July 2015
प्रासंगिक - कोकिला व्रत
अखंड सोभाग्य की कामना के लिए इस बार कोकिला व्रत का संयोग 19 वर्ष बाद आ रहा है द्वितीय आषाढ़ शुक्ल की पूर्णिमा (31 जुलाई 2015)से श्रावण माह की पूर्णिमा तक यह व्रत चलेगा जिसमे महिलाये कोयल की मूर्ति बना कर स्वर्ण के पंख और मोती की आँख लगा कर उसकी पूजा कर ब्राम्हण से कथा सुनकर कोयल की आवाज सुनकर ही व्रत खोलती है परन्तु विडम्बना यह है की कोयल की आवाज़ सुनी कहा जाए 19 वर्षों में जो पर्यावरण में बदलाव आया है और कंक्रीट का जो जंगल उग आया है वहां कोयल कहा और कोयल ही क्यों गौरया, टिटोड़ी तोता मैना किसी की भी आवाज़ नहीं सुनाई देती ....
माना की हमारे पूर्वज प्रकृति प्रेमी थे और हमारी संस्कृति में पर्यावरण का महत्व था मसलन पीपल, बड, नीम की पूजा होती है तो क्या ये जरुरी नहीं की हम अपनी संस्कृति को बचने के लिए पर्यावरण को बचाए ? और यदि नहीं बचा पाए तो क्या हमारे व्रत उपवास पूजा पाठ सब ख़त्म .....
खैर ये तो भविष्य की बाते है परन्तु वर्तमान में मुझे उन महिलाओं की चिंता है जो कोयल की आवाज सुन कर व्रत खोलेंगी
-भूषण जैन 30 जुलाई 2015
Monday, 20 July 2015
“बाहुबली” के माध्यम से एस.
एस. राजमोली ने जो सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये है वाकई राजमोली और उनकी
टीम बधाई की पात्र है. यदि सच कहा जाये तो ये सफलता है मेहनत और लगन की जिसने 8
साल के सपने को साकार किया है सच में कल्पनाशीलता और तकनीक के समागम का ये जादुई
संसार सर चढ़ कर बोलता है मै स्वयं इस फिल्म को तीन बार देखने के बाद भी. पुनः इसे
देखने को लालाईत हूँ ...परन्तु प्रश्न ये है की क्या राज मोली के इस रचनात्मक
कीर्तिमान के बाद भारतीय सिनेमा में तकनीक और बड़े बजट की भव्यता का एक नया सिनेमाई
दौर आरम्भ होगा .....क्या यथार्थवादी सिनेमा का अस्तित्व नहीं रहेगा ....खैर जो भी
हो ये तो भविष्य के गर्भ में है
हाँ इस समय बधाई देना चाहूँगा बाहुबली के पिता को
यानि की एस. एस. राजमोली के पिता विजेंद्र प्रसाद जी को जिनकी लिखी दो फिल्मे एक
साथ सिनेमाघरों में है “बाहुबली” और “बजरंगी भाई जान”
Sunday, 28 June 2015
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