Monday, 10 August 2015

Film "Masaan" "fly away solo" n Dushyat kumar

तू  किसी  रेल  सी  गुजरती  है
मैं  किसी  पुल  सा  थरथराता  हूँ
इन पंक्तियों के साथ साथ बनारस के प्राचीन पुल के ऊपर दूर से रेल का गुजरना अच्छा लगता है
कुल मिला कर मसानपर दुष्यंत कुमार का प्रभाव दिखा मै भी दुष्यंत जी से प्रभावित हूँ पर कभी मुलाकात नहीं हुई उनकी रचनाएं अवश्य नाटको में उनसे रूबरू कराती रही है परन्तु अगर आज की पीढ़ी की बात करे तो शायद हालत कुछ ऐसे है यहाँ दरख्तों के साए में धुप लगती है क्यों की आज के नौजवान मसान फिल्म के  दीपक की तरह ही सवाल करता है जैसे कौन ग़ालिब और कौन निदा फ़ाजली
खैर अंत मै एक बार फिर कहूँगा की मुझे दुष्यंत जी की पूरी कविता ही फिल्म की कहानी लगी

एक जंगल है तेरी आँखों में
मै जहां राह भूल जाता हूँ
मै तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने करीब पाता हूँ
तू किसी रेल सी गुजरती है
मै किसी पुल सा थरथराता हूँ
हर तरफ एतराज होता है
मै अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाजू उखड गया जब से
और ज्यादा वजन उठता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में..

फिल्म बहुत उम्दा है बधाई नीरज भाई 

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