Thursday, 30 July 2015

प्रासंगिक - कोकिला व्रत 
अखंड सोभाग्य की कामना के लिए इस बार कोकिला व्रत का संयोग 19 वर्ष बाद आ रहा है द्वितीय आषाढ़ शुक्ल की पूर्णिमा (31 जुलाई 2015)से श्रावण माह की पूर्णिमा तक यह व्रत चलेगा जिसमे महिलाये कोयल की मूर्ति बना कर स्वर्ण के पंख और मोती की आँख लगा कर उसकी पूजा कर ब्राम्हण से कथा सुनकर कोयल की आवाज सुनकर ही व्रत खोलती है परन्तु विडम्बना यह है की कोयल की आवाज़ सुनी कहा जाए 19 वर्षों में जो पर्यावरण में बदलाव आया है और कंक्रीट का जो जंगल उग आया है वहां कोयल कहा और कोयल ही क्यों गौरया, टिटोड़ी तोता मैना किसी की भी आवाज़ नहीं सुनाई देती ....
          माना की हमारे पूर्वज प्रकृति प्रेमी थे और हमारी संस्कृति में पर्यावरण का महत्व था मसलन पीपल, बड, नीम की पूजा होती है तो क्या ये जरुरी नहीं की हम अपनी संस्कृति को बचने के लिए पर्यावरण को बचाए ? और यदि नहीं बचा पाए तो क्या हमारे व्रत उपवास पूजा पाठ सब ख़त्म .....
     खैर ये तो भविष्य की बाते है परन्तु वर्तमान में मुझे उन महिलाओं की चिंता है जो कोयल की आवाज सुन कर व्रत खोलेंगी   
-भूषण जैन 30 जुलाई 2015


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