Monday, 12 May 2014

Jain Kahaniya I - ANJAN CHOUR 01.wmv

Tuesday, 6 May 2014

जिसके हम मामा हैं

एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।

'मामाजी! मामाजी!' - लड़के ने लपक कर चरण छूए।

वे पहचाने नहीं। बोले - 'तुम कौन?'

'मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे?'

'मुन्ना?' वे सोचने लगे।

'हाँ, मुन्ना। भूल गए आप मामाजी! खैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गए।'

'तुम यहाँ कैसे?'

'मैं आजकल यहीं हूँ।'

'अ'अच्छा।'

'हाँ।'

मामाजी अपने भानजे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर।

फिर पहुँचे गंगाघाट। सोचा, नहा लें।

'मुन्ना, नहा लें?'

'जरूर नहाइए मामाजी! बनारस आए हैं और नहाएँगे नहीं, यह कैसे हो सकता है?'

मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे।

बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब! लड़का... मुन्ना भी गायब!

'मुन्ना... ए मुन्ना!'

मगर मुन्ना वहाँ हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं।

'क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है?'

'कौन मुन्ना?'

'वही जिसके हम मामा हैं।'

'मैं समझा नहीं।'

'अ'अरे, हम जिसके मामा हैं वो मुन्ना।'

वे तौलिया लपेटे यहाँ से वहाँ दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला।

भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के नाते हमारी यही स्थिति है मित्रो! चुनाव के मौसम में कोई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है। मुझे नहीं पहचाना मैं चुनाव का उम्मीदवार। होनेवाला एम.पी.। मुझे नहीं पहचाना? आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर गायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया।

समस्याओं के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं - क्यों साहब, वह कहीं आपको नजर आया? अरे वही, जिसके हम वोटर हैं। वही, जिसके हम मामा हैं।

पाँच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं।

- शरद जोशी

Thursday, 9 January 2014

कोई और.....

कल  नाटक की रिहर्सल में हम सभी साथी कलाकार दंगे का एक द्रश्य बनाने की कोशिश कर रहे थे| लेकिन किसी को भी समझ नहीं आया की दंगा शुरू केसे करे? तब एक बात मुझे समझ में आई की वो कोई और होते होंगे जो ....

Thursday, 19 September 2013

करबद्ध क्षमायाचना

कामनाये मोक्ष की और भावनाएं भोग की
जिंदगी जंजाल है बस इसी संजोग की
 चाहता हूँ सब सही हो किन्तु हो पाता नहीं
 कब अवज्ञा हो गई कुछ समझ आता नहीं 
इस विकट सग्राम को किस शस्त्र से लडूँ ?
आपसे "उत्तम क्षमा" मिले तो फिर में आगे बढूँ ...
मन वचन कर्म से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष में मेरे द्वारा यदि आपको कष्ट हुआ हो तो आत्मशुद्धि के इस पावन पर्व पर करबद्ध क्षमायाचना - भूषण जैन 

Saturday, 23 February 2013

अभी कुछ दिनों से फिल्मो में किताबो उपन्यासों से कहानी लेकर फिल्म बनाने का जो सिलसिला चल पड़ा है काबिलेतारीफ़ है इस लिए नहीं की फ़िल्मकार मूल रचना को उलटफेर कर के प्रस्तुत करते है या साहित्य की आत्मा ही मार देत३ए है बल्कि इसलिए की मूल रचना और उसपर आधारित फिल्म में क्या अंतर है जानने के लिए ही सही कम से कम हमारे युवा साहित्य को पढने तो लगे है और दूसरा ये की घिसी पीती फार्मूला फिल्मो से निजत मिली कुछ नया देखने को मिलने लगा धन्यवाद्