अभी कुछ दिनों से फिल्मो में किताबो उपन्यासों से कहानी लेकर फिल्म बनाने का जो सिलसिला चल पड़ा है काबिलेतारीफ़ है इस लिए नहीं की फ़िल्मकार मूल रचना को उलटफेर कर के प्रस्तुत करते है या साहित्य की आत्मा ही मार देत३ए है बल्कि इसलिए की मूल रचना और उसपर आधारित फिल्म में क्या अंतर है जानने के लिए ही सही कम से कम हमारे युवा साहित्य को पढने तो लगे है और दूसरा ये की घिसी पीती फार्मूला फिल्मो से निजत मिली कुछ नया देखने को मिलने लगा धन्यवाद्
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